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शनिवार, 20 अप्रैल 2013


 जानवर 


कुछ जानवर  घूम रहें
आदमी  के भेष में
इन जानवरों को
भूख नहीं अन्न की
ये तो भूखे प्यासे हैं
वासनाओं की भूख के
जन्में जिस कोख से
उसी कोख से ये
दरिंदगी दिखा रहे
भूख नहीं अन्न की
उसी कोख से ये
भूख भी मिटा रहे
आदमी के भेष में
कुछ घूम रहे जानवर
होशियार खबरदार
भेडियों से भी जंगली
हैं दरिन्दे ये जानवर
बहु, बेटी और बच्चियों के
भूखे हैं ये जानवर
आदमी के भेष में
कुछ घूम रहें जानवर
..........आनंद विक्रम......

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
साझा करने के लिए आभार...!